अर्थ और रूप
कूर्मावतार का शाब्दिक अर्थ होता है कूर्म रूप में अवतार | कूर्म को कच्छप (कछुआ) कहते हैं अर्थात जब विष्णु भगवान ने कछुए के रूप में अवतार लिया था तब उनका नाम कूर्मावतार या कच्छपवतार पड़ा |
पुराणों में वर्णन के अनुसार भगवान विष्णु ने ये रूप सृष्टि के कल्याण हेतु मंदार पर्वत को अपनी पीठ पर सँभालने के लिए लिया था, जिसका उपयोग समुन्दर मंथन के लिए किया जाना था | विष्णु भगवान का कूर्मावतार इतना विशालकाय था के पुराणों में उनकी पीठ का घेरा एक लाख योजन के बराबर था |
 

 
कथा
एक बार दुर्वासा ऋषि देवराज इंद्र पर प्रसन्न होकर उन्हें पारिजात के फूलों की माला भेंट स्वरुप प्रदान करतें हैं और इंद्र उसे स्वीकार तो करते हैं परन्तु इंद्र नें इसे ग्रहण तो किया परन्तु अपने वाहन ऐरावत हाथी  को पहना दिया और ऐरावत नें उसे भूमि पर फेंक दिया और अपने पैरों से कुचल दिया, दुर्वासा ऋषि को ये अच्छा नहीं लगा और उन्होंने क्रोधित होकर देवताओं को श्राप दे दिया के वो सभी श्री हीन हो जाएँ | इसके कारण देवताओं ने अपनी साड़ी शक्ति और साड़ी सम्पदा को खो दिया | इस प्रकार सभी निराशा लेकर ब्रह्मा जी के पास उपाय के लिए जाते हैं | ब्रह्मा जी ने देवताओं को श्री हरी विष्णु जी की शरण में जाने को कहा | विष्णु ने उन्हें यह सलाह दी कि वे क्षीर समुद्र का मंथन करें जिससे उनकी सारी सम्पदा और शक्ति वापिस आ जाएगी और इसी के साथ समुन्द्र से अमृत आदि रत्नों की भी प्राप्ति होगी | जिसके फलस्वरूप देवता सदा के लिए अमर हो जाएँगे। इस विशाल कार्य को करने के लिए एक विशाल मथनी और उसी तरह विशाल रस्सी की जरूरत थी और ये कार्य सिर्फ देवताओं के वश में भी नहीं था | तब असुर राज बलि से और मन्दर पर्वत और नागराजवासुकी (नागराज शेषनाग के छोटे भाई) से सहायता मांगी | जिसके परिणाम स्वरुप मंथन के लिए पर्वत को डंडे की तरह और नागराज वासुकि को रस्सी की भांति उपयोग हुआ | इस महान कार्य के लिए असुरों को भी देवताओं का साथ देना था, जिससे देवता बहुत ज्यादा चिंतित थे |
विष्णु भगवान के आश्वासन पर देवता असुरों के साथ मिलकर समुन्द्र मंथन के लिए तैयार हो गए | परन्तु इतने विशालकाय पर्वत को समुन्द्र में स्थिर रखने के लिए कोई उपाय कुछ नहीं सुझा तो श्री हरी विष्णु कछावतार में आ गए और एक बहुत बड़े कछुए का रूप ले लिया जिससे वो मंदार पर्वत को अपनी पीठ पर धारण कर सके | उस कछुए के पीठ का व्यास 100,000 योजन था। इस प्रकार से भगवान का कूर्म अवतार हुआ।
समुन्द्र मंथन से अनेक रत्न और अमृत प्रकट हुआ | जो असुर और देवताओं के बीच फिर से संग्राम का कारण बना | इस संग्राम को रोकने के लिए भी भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार लिया जो एक सुन्दर स्री रूप में था | तब मोहिनी अवतार ने चालाकी से अमृत कलश असुरों से लेकर देवतों को अमृत पिलाया था | उसी समय छल से एक स्वरभानु नमक राक्षस ने देवताओं के बीच जाकर अमृत का सेवन कर लिया तब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप त्याग कर अपने असली रूप में आकर सुदर्शन चक्र से उसका सर धड़ से अलग कर दिया | तब से स्वरभानु का सिर राहु नाम से और धड़ केतु के नाम से अंतरिक्ष में स्थापित हो गया | क्यूंकि इसकी चालाकी को सूर्य और चन्द्रमा ने उजागर किया था इसलिए वैर भाव के कारन सूर्य और चन्द्रमा को राहु और केतु ग्रहण लगते हैं |