श्री राम चालीसा

  • Updated: Jan 10 2024 04:21 PM
श्री राम चालीसा

श्री राम चालीसा

श्री रघुवीर भक्त हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥

निशिदिन ध्यान धरै जो कोई। ता सम भक्त और नहिं होई॥१॥

हे रघुकुल शिरोमणि, भक्तों के कल्याण कर्ता, हे श्री राम आप हमारी प्रार्थना स्वीकार कीजिये कर सुन लीजिये। हे प्रभु आपका ध्यान करने वाले और आपका सुमिरन करने वाले भक्तों के जैसा कोई और नहीं होता होता है।

 

ध्यान धरे शिवजी मन माहीं। ब्रह्म इन्द्र पार नहिं पाहीं॥

दूत तुम्हार वीर हनुमाना। जासु प्रभाव तिहूं पुर जाना॥२॥

स्वयंभू भगवान महादेव भी आपका ही ध्यान करते हैं, ब्रह्मा और इंद्र आदि देवता भी आपका पार नहीं पा सके अर्थात आपकी लीला और आपकी महिमा को नहीं जान सके। महावीर हनुमान आपके दूत हैं और उनका प्रभाव तीनों लोको में सूर्य के प्रकाश की भांति उजागर है।

 

तब भुज दण्ड प्रचण्ड कृपाला। रावण मारि सुरन प्रतिपाला॥

तुम अनाथ के नाथ गुंसाई। दीनन के हो सदा सहाई॥३॥

हे प्रभु आपकी भुजाओं में प्रचण्ड शक्ति है और आप उनसे कृपा ही करते हैं। हे सुरों के प्रतिपालक आपने रावण जैसे दुष्ट का वध करके उसको दण्ड दिया। हे स्वामी आप अनाथों के नाथ हो आप दीनों पर दया करने वाले हो।

 

ब्रह्मादिक तव पारन पावैं। सदा ईश तुम्हरो यश गावैं॥

चारिउ वेद भरत हैं साखी। तुम भक्तन की लज्जा राखीं॥४॥

ब्रह्मा आदि देवता भी आपका पूर्ण ज्ञान नहीं पा सके और सभी ईश्वर भी आपकी कीर्ति का बखान करते हैं। चारों वेदों में आपकी महिमाओं का वर्णन है के आपने सर्वदा अपने भक्तों की लाज रखी है।

 

गुण गावत शारद मन माहीं। सुरपति ताको पार पाहीं॥

नाम तुम्हार लेत जो कोई। ता सम धन्य और नहिं होई॥५॥

हे प्रभु शारदे मां भी गुणगान करती हैं और सुरपति इंद्र भी आपकी महिमा का पार पा सके। जो भी आपका नाम रुपी धन को पा लेता है, उसके समान धन्य और कोई भी नहीं है।

 

राम नाम है अपरम्पारा। चारिहु वेदन जाहि पुकारा॥

गणपति नाम तुम्हारो लीन्हो। तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हो॥६॥

हे श्री राम आपका नाम अपरम्पार है, चारों वेदों ने पुकार-पुकार कर इसका ही बखान किया है। अर्थात चारों वेद आपकी महिमा को मानते हैं। जब भगवान श्री गणेश ने भी आपके नाम का स्मरण किया, तो आपकी कृपा ने सबसे पहले उन्हें पूजनीय आपने ही बनाया।

 

शेष रटत नित नाम तुम्हारा। महि को भार शीश पर धारा॥

फूल समान रहत सो भारा। पाव कोऊ तुम्हरो पारा॥७॥

शेषनाग भी हमेशा आपके नाम का जाप के प्रताप से पृथ्वी के भार को अपने सिर पर धारण किये हुए हैं। आपके स्मरण से बड़े से बड़ा भार भी फूल के समान लगता है। हे प्रभु आपका पार कोई नहीं पा सकता अर्थात आपकी महिमा को कोई नहीं जान सकता।

 

भरत नाम तुम्हरो उर धारो। तासों कबहुं रण में हारो॥

नाम शक्षुहन हृदय प्रकाशा। सुमिरत होत शत्रु कर नाशा॥८॥

भरत ने आपका नाम अपने हृद्य में धारण किया जिसके प्रताप से उन्हें युद्ध में कोई हरा नहीं सका। शत्रुघन के हृदय में भी आपके नाम का प्रकाश था इसलिए तो आपका स्मरण करते ही वे शत्रुओं का नाश कर देते थे।

 

लखन तुम्हारे आज्ञाकारी। सदा करत सन्तन रखवारी॥

ताते रण जीते नहिं कोई। युद्घ जुरे यमहूं किन होई॥९॥

लक्ष्मण जी सदा ही आपके आज्ञाकारी रहे हैं जिन्होंनें हमेशा संतों की रखवाली की सुरक्षा की। युद्ध में स्वयं यमराज क्यों लड़ रहे हों तो भी उनसे कोई युद्ध नहीं जीत सकता था।

 

महालक्ष्मी धर अवतारा। सब विधि करत पाप को छारा॥

सीता राम पुनीता गायो। भुवनेश्वरी प्रभाव दिखायो॥१०॥

आपके सा -साथ मां महालक्ष्मी ने हर विधि से पाप का नाश करने के लिए माता सीता का रूप धारण किया। मां भुवनेश्वरी आपके साथ सीता रूप में अपना प्रभाव दिखाती हैं इसीलिए सीता राम का पवित्र नाम गाया जाता है।

 

घट सों प्रकट भई सो आई। जाको देखत चन्द्र लजाई॥

सो तुमरे नित पांव पलोटत। नवो निद्घि चरणन में लोटत॥११॥

माता सीता जब पृथ्वी से घट यानि घड़े में प्रकट हुई इनका रुप इतना सुंदर था कि जिन्हें देखकर चंद्रमा भी शरमा जाए। हे प्रभु जो नित्य आपके चरणों को धोता है नौ निधियां उसके चरणों में लौट लगाती हैं।

 

सिद्घि अठारह मंगलकारी। सो तुम पर जावै बलिहारी॥

औरहु जो अनेक प्रभुताई। सो सीतापति तुमहिं बनाई॥१२॥

उसके लिए अठारह सिद्धियां (मार्कंडेय पुराण के अनुसार सिद्धियां आठ होती हैं जबकि ब्रह्मवैवर्त पुराण में अठारह बताई गई हैं) मंगलकारी होती हैं जो आप पर न्यौछावर हैं। हे सीता पति भगवान श्री राम, सभी देवताओं में जो भी देवत्तव है वो सब आपके प्रकाश से विधमान है।

 

इच्छा ते कोटिन संसारा। रचत लागत पल की बारा॥

जो तुम्हे चरणन चित लावै। ताकी मुक्ति अवसि हो जावै॥१३॥

आपकी इच्छा से ही स्वयं भगवान ब्रह्मा जी करोड़ों संसारों की रचना करने में भी पल भर की देरी नहीं करते। जो आपके चरणों में ध्यान लगाता है उसकी मुक्ति अवश्य हो जाती है।

 

जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरूपा। नर्गुण ब्रह्म अखण्ड अनूपा॥

सत्य सत्य जय सत्यव्रत स्वामी। सत्य सनातन अन्तर्यामी॥१४॥

हे ज्योति स्वरुप प्रभु, आपकी जय हो। आप ही निर्गुण ईश्वर हैं, जो अद्वितीय है, अखंडित है। हे सत्य रुप, सत्य के पालक आप ही सत्य हैं, आपकी जय हो। अनादिकाल से ही आप सत्य हैं, अंतर्यामी हैं।

 

सत्य भजन तुम्हरो जो गावै। सो निश्चय चारों फल पावै॥

सत्य शपथ गौरीपति कीन्हीं। तुमने भक्तिहिं सब विधि दीन्हीं॥१५॥

सच्चे हृदय से जो आपका भजन करता है, उसे चारों फल प्राप्त होते हैं। इसी सत्य की शपथ भगवान शंकर ने की जिससे आपने उन्हें भक्ति के साथ-साथ सब सिद्धियां भी दी।

 

सुनहु राम तुम तात हमारे। तुमहिं भरत कुल पूज्य प्रचारे॥

तुमहिं देव कुल देव हमारे। तुम गुरु देव प्राण के प्यारे॥१६॥

हे श्री राम सुन लिजिये आप ही हमारे पिता हैं, आप ही भारतवर्ष में पूज्य हैं। हे देव आप ही हमारे कुलदेव हैं, हे गुरु देव आप हमें प्राणों से प्यारे हैं।

 

जो कुछ हो सो तुम ही राजा। जय जय जय प्रभु राखो लाजा॥

राम आत्मा पोषण हारे। जय जय दशरथ राज दुलारे॥१७॥

हे प्रभु श्री राम हमारे जो कुछ भी हैं, सब आप ही हैं, हमारी लाज रखिये, आपकी जय हो प्रभु। हे हमारी आत्मा का पोषण करने वाले दशरथ प्यारे भगवान श्री राम, आपकी जय हो।

 

ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरूपा। नमो नमो जय जगपति भूपा॥

धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा। नाम तुम्हार हरत संतापा॥१८॥

हे ज्ञान स्वरुप, हमारे हृदय को भी ज्ञान दो, हे जगपति, हे ब्रह्माण्ड के राजा, आपकी जय हो, हम आपको नमन करते हैं। आपका प्रताप धन्य है, आप भी धन्य हैं, प्रभु आपका नाम सारे संतापों अर्थात सारे कष्टों का हरण कर लेता है।

 

सत्य शुद्घ देवन मुख गाया। बजी दुन्दुभी शंख बजाया॥

सत्य सत्य तुम सत्य सनातन। तुम ही हो हमरे तन मन धन॥१९॥

आप ही शुद्ध सत्य हैं, जिसे देवताओं ने अपने मुख से गाया था, जिसके बाद शंख की दुंदुभी बजी थी। अनादिकाल से आप ही सत्य हैं, हे प्रभु आप ही हमारा तन-मन-धन हैं।

 

याको पाठ करे जो कोई। ज्ञान प्रकट ताके उर होई॥

आवागमन मिटै तिहि केरा। सत्य वचन माने शिर मेरा॥२०॥

जो कोई भी इसका पाठ करता है, उसके हृदय में ज्ञान का प्रकाश होता है, अर्थात उसे सत्य का ज्ञान होता है। उसका आवागमन मिट जाता है, भगवान शिव भी मेरे इस वचन को सत्य मानते हैं।

 

और आस मन में जो होई। मनवांछित फल पावे सोई॥

तीनहुं काल ध्यान जो ल्यावै। तुलसी दल अरु फूल चढ़ावै॥२१॥

यदि और कोई इच्छा उसके मन में होती हैं तो इच्छानुसार फल प्राप्त होते हैं। जो कोई भी तीनों काल प्रभु का ध्यान लगाता है। प्रभु को तुलसी दल फूल अर्पण करता है।

 

साग पत्र सो भोग लगावै। सो नर सकल सिद्घता पावै॥

अन्त समय रघुबरपुर जाई। जहां जन्म हरि भक्त कहाई॥२२॥

साग पत्र से भोग लगाता है, उसे सारी सिद्धियां प्राप्त होती हैं। अंतिम समय में वह रघुबर पुर अर्थात स्वर्गलोक में गमन करता हैं, जहां पर जन्म लेने से ही जीव हरिभक्त कहलाता है।

 

श्री हरिदास कहै अरु गावै। सो बैकुण्ठ धाम को पावै॥२3

श्री हरिदास भी गाते हुए कहते हैं वह बैकुण्ठ धाम को प्राप्त करता है।

 

दोहा॥

सात दिवस जो नेम कर, पाठ करे चित लाय।

हरिदास हरि कृपा से, अवसि भक्ति को पाय॥

राम चालीसा जो पढ़े, राम चरण चित लाय।

जो इच्छा मन में करै, सकल सिद्घ हो जाय॥

यदि कोई भी सात दिनों तक नियम पूर्वक ध्यान लगाकर पाठ करता है, तो हरिदास जी कहते हैं कि भगवान विष्णु की कृपा से वह अवश्य ही भक्ति को पा लेता है। राम के चरणों में ध्यान लगाकर जो कोई भी, इस राम चालीसा को पढ़ता है, वह जो भी मन में इच्छा करता है, वह पूरी होती है।

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