मतस्य कर अर्थ है मछली - यानी मतस्य रूप में जब विष्णु भगवान ने अवतार लिया था तो उसी रूप को मत्तस्यावतार कहते हैं |
पुराणों के अनुसार विष्णु भगवान ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण उद्देश्य की पूर्ति हेतु इस रूप में अवतरित हुए थे | प्रयोजन था प्रलय से मनु और सप्तऋषियों की रक्षा करना |
मत्स्य और मनु
सृष्टि के प्रारम्भ में एक बार इस पृथ्वी पर मनु नामक पुरुष हुए। वे परम प्रतापी धर्मपरायण राजा थे और भगवान विष्णु के परम भक्त थे। एक बार वे सुबह के समय सूर्यनारायण को अर्घ्य दे रहे थे तभी एक मछली नें उनसे कहा कि आप मेरी रक्षा करें और मुझे अपने कमंडल में स्थान दें | दया और धर्म के अनुसार इस राजा ने मछली को अपने कमंडल में ले लिया और घर की ओर निकले, घर पहुँचते तक वह मत्स्य उस कमंडल के आकार का हो गया और मछली ने एक बड़े पात्र में रखने को कहा राजा नें इसे एक पात्र में रखा परंतु कुछ समय बाद वह मत्स्य उस पात्र के आकार की हो गई। राजा जितने बड़े पात्र का प्रबंध करते मछली का अकार उतना ही बड़ा हो जाता | अंत में राजा नें उसे समुद्र में डाला तो उसने पूरे समुद्र के समान अकार ले लिया | तब राजा ने हाथ जोड़कर बड़ी ही विनम्रता से कहा के आप जरूर कोई मायावी हैं और किसी उद्देश्य से मेरे साथ इस प्रकार लीला कर रहे हैं | कृपा करके आप अपने वास्तविक रूप में दर्शन दें | तब उस सुनहरी-रंग मछली (जो वास्तविक में श्री विष्णु भगवान थे) ने अपने दिव्य पहचान उजागर की और अपने भक्त को यह सूचित किया कि उस दिन के ठीक सातवें दिन प्रलय आएगा और तत्पश्चात विश्व का नया श्रृजन होगा और मनु को सभी जड़ी-बूटी, बीज और पशुओं, सप्त ऋषि आदि को इकट्ठा करके प्रभु द्वारा भेजे गए नाव में संचित करने को कहा। प्रलय आने पर ही मत्स्य रूपी भगवान विष्णु ने नाव को स्वयं खींचकर इस संसार को प्रलय से बचाया था।
तत्पश्चात भगवान विष्णु ने अपने प्रत्यक्ष रूप में दर्शन दिए | 

ॐ मतस्याय मनुकल्पाय नम:
मतस्य अवतार के प्रयोजन से जुड़ी एक कथा और है जिसका वर्णन पुराणों में मिलता है | हयग्रीवासुर या हयग्रीव एक प्रसिद्ध तथा प्राचीन दैत्य और महर्षि कश्यप और दिति का पुत्र था। हिरण्याक्ष, रक्तबीज, धूम्रलोचन और हिरण्यकशिपु उसके छोटे भाई तथा वज्रंगासुर और अरुणासुर उसके बड़े भाई थे तथा उसकी बहिन का नाम होलिका था। ऐसा कहा जाता है कि हयग्रीवासुर एक ऐसा दैत्य था जो जल , थल या आकाश में कहीं भी रह सकता था तथा वह मनुष्यों के मुख वाला ही दैत्य था।
ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की तथा सप्तऋषि तथा सनाकदि मुनियों की भी उत्पत्ति की। ब्रह्मा जी के मानस पुत्र सप्तऋषियों में से एक ऋषि महर्षि मरीचि थे। उनके पुत्र महर्षि कश्यप हुए। कश्यप ने दक्ष प्रजापति की सत्रह कन्याओं से विधिपूर्वक विवाह करके उनसे समस्त जातियां उत्पन्न की। कश्यप की एक पत्नी का नाम दिति था जो दैत्यों की माता थीं। दिति ने तेजस्वी दैत्य वज्रांग , अरुण और हयग्रीव को जन्म दिया। हयग्रीव ब्रह्मा जी से वेद चुराकर ले गया और समुद्र की गहराई में छिपा दिया। भगवान विष्णु को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने हयग्रीव का वध करने का निश्चय किया। मत्स्य रूपी भगवान विष्णु ने समुद्र में हयग्रीवासुर के राज्य में प्रवेश किया तो हयग्रीवासुर के सिपाही मत्स्य रूपी भगवान विष्णु को मारने के लिए दौड़े। मत्स्य रूपी भगवान विष्णु ने उनका भी वध कर दिया और हयग्रीवासुर के सिपाहियों को मारकर आख़िरकार, उन्होंने हयग्रीव को भी मार डाला और वेदों को उसके कारागार स्रोत से निकालकर उन्हें अपने मुख में स्थापित किया। इसके बाद, वे बाहर निकले और मनु की नौका को खींचकर इस संसार को जल प्रलय से उद्धार किया। जब प्रलय अंत हो गया, तो भगवान विष्णु ने वेदों को ब्रह्मा जी के हाथों में सौंप दिया।
 
 
