ऋषि, महर्षि, ब्रह्मर्षि

  • Updated: Aug 22 2023 08:06 PM
ऋषि, महर्षि, ब्रह्मर्षि

ऋषि, महर्षि, ब्रह्मर्षि

भारत प्रारम्भ से ही ऋषियों की भूमि रहा है | ऋषियों को वैदिक काल से ही पूजा जाता है | ऋषियों का महत्व सिर्फ धार्मिक ही नहीं अपितु आध्यात्मिक और विधा की दृष्टि से भी है | वैदिक काल से ही ऋषियों ने समाज का मार्गदर्शन किया है वो चाहे शिक्षा का क्षेत्र हो या चिकित्सा का | ऋषि हमेशा से ही लोगों की समस्याओं का समाधान धर्म और आध्यात्म के द्वारा करते आये हैं | भारत में आज भी बहुत से साधु संत और ऋषि मुनि देखे जाते हैं | आज कल लोग सभी को समान समझते हैं परन्तु इनकी पहचान अलग अलग हैं |

ऋषि

जो व्यक्ति सैकड़ों वर्षों के तप द्वारा ज्ञान अर्जित कर वैदिक ऋचाओँ की रचना करते थे उन्हें ऋषि कहा जाता था | ये अपने ज्ञान और तप के बल पर परमात्मा को प्राप्त कर लेते थे और जगत में व्याप्त पदार्थों के पीछे छिपे गूढ़ रहस्य जिसे तत्व ज्ञान कहते हैं उसे और उसे भीतर की ऊर्जा को भी पहचान लेते थे | ऋषियों को ज्ञान अपने तप और आध्यात्म के आधार पर प्राप्त होता था | अधिकतर ऋषि गृहस्थ आश्रम में अपना जीवन जीते थे | ऋषि अपने योग के माध्यम से अपने शिष्यों को को आत्मज्ञान का बोध करते थे | साधारण भाषा में अगर कहें तो जिन मनुष्यों के ज्ञान चक्षु जाग्रत हो जाता था वो ऋषि कहलाते थे |

हिन्दू पुराणों में सप्तऋषियों के उल्लेख मिलता है |

केतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ठ तथा भृगु।

महर्षि

ऋषियों से ऊपर महर्षि आते हैं जो ऋषि ज्ञान, तप और योग की उच्चतम सीमा को प्राप्त कर लेते हैं उन्हें ही महर्षि कहा जाता है | ज्ञान चक्षु के बाद जिनका दिव्य चक्षु जाग्रत हो जाता है उन्हें ही महर्षि कहा जाता है | पुराणों में अनेकों महाऋषियों का वर्णन मिलता है जैसे महर्षि वाल्मीकि, महर्षि दधीचि, महर्षि व्यत्स्यायन आदि | इस जगत के अंतिम महर्षि दयानन्द सरस्वती जी थे जिन्होंने मूल मंत्रों को जानकार उनकी व्याख्या की थी | महर्षि मोह माया को त्याग कर परमात्मा में विलीन रहते थे |

ब्रह्मऋषि

ब्रह्मऋषि का अर्थ होता है ब्रह्म को देखने वाला अर्थात जिन्हे ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति हो चुकी हो | जिनका परम चक्षु जाग्रत हो चूका हो उन्हें ही ब्रह्मऋषि कहा जाता है | दधीचि, भारद्वाज, भृगु, वसिष्ठ जैसे ऋषियों को ब्रह्म ऋषि श्रेणी में रखा जाता है |

हिन्दू प्राणों और वेदों में ऋषियों को सात श्रेणी में बांटा गया हैं 

सप्त ब्रह्मऋषि, देवऋषि, महर्षि, परमर्षयः |

कण्डर्षिश्च, श्रुतर्षिश्च, राजर्षिश्च क्रमावशः

1. ब्रह्मऋषि जिन्हे ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो चका हो |

2. देवऋषि वो देव जो ऋषि है या देवताओं के ऋषि जैसे की नारद कण्व |

3. महान ऋषि या ज्ञान और तप की उच्चतम सीमा को प्राप्त करने वाले ऋषि | जैसे वेदव्यास, वाल्मीकि और दधीचि |

4. परमऋषि अर्थात ऋषिओं में श्रेष्ठ |

5. काण्ड ऋषि जो ऋषि वेदो या पुराणों की किसी एक शाखा या काण्ड की व्याख्या करने वाले ऋषि जैसे ऋषि जैमिनी |

6. जो ऋषि श्रुति रचनाओं में पारंगत होते हैं उन्हें श्रुतऋषि कहा जाता है |

7. राजऋषि जो ऋषि राजा थे या राजाओं के ऋषि हैं उन्हें राजऋषि कहा जाता है | जैसे महर्षि विश्वामित्र, राजा जनक आदि |

मुनि

मुनि शब्द के अर्थ में भिन्नता देखी जाती है बहुतायत में मुनि शब्द का अर्थ मौन से जोड़ा जाता है परन्तु इसका अर्थ होता है मनन जो व्यक्ति ईश्वर का भजन और मनन करते हैं कहा जाता है | ये ईश्वर की भक्ति में ध्यान लगाते हुए समाज का मार्गदर्शन करते हैं | देवऋषि नारद को मुनि भी कहा जाता है क्यूंकि वो हमेशा नारायण का जप रहते हैं | मुनि ऋषि बनने के श्रेणी में पहला कदम भी मन जाता है |

साधु

साधु शब्द का अर्थ है साधना करने वाला जो व्यक्ति काम, क्रोध, मोह, लोभ, मद और मतस्य का त्याग कर देते हैं उन्हें साधु कहा जाता है | साधु लोग साधना करते हुए सरल स्वभाव और सकारात्मक सोच रखते हुए साधना करते रहते हैं |

सन्यासी

सन्यास का अर्थ है त्याग जो व्यक्ति सांसारिक सुखों का, अपने गृहस्थ का, सम्पति का और समाज का त्याग करता है उन्हें सन्यासी कहते हैं | ये लोग सन्यास अपना कर मन क्रम वचन से अपने आराध्य के ध्यान में लगे रहते हैं |

संत

संत शब्द संस्कृत के शांत शब्द से बना है | अतः जो स्वाभाव में शांत हो और सत्य का आचरण करता हो और आत्मज्ञानी भी हो | इससे अलग हमारे शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति भगवान की भक्ति में लीन रहते हैं उन्हें भी संत कहते हैं | जो व्यक्ति अपने सांसारिक और आध्यात्मिक जीवन में संतुलन बना लेता है उसे भी संत कहा जाता है |

तपस्वी

तपस्वी वो व्यक्ति होते होते हैं जो तप अर्थात तपस्या करके ज्ञान प्राप्त हैं या ईश्वर को प्राप्त करते हैं | तपस्वी के लिए तपस्या से पूर्व ज्ञानी होना अनिवार्य नहीं है |

यति पुरुष

पुरुष यति सो जानिए, निज प्रिय तक विचार | 

माता बहन पुत्री सकल, और जग की नार

यति पुरुष वो पुरुष है जो अपनी पत्नी से अलग किसी स्री में आसक्ति न रखे और आयु अनुसार जग की अन्य स्त्रियों को माता, बहन और पुत्री समझे |  

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