जगन्नाथ धाम

  • Updated: Oct 01 2023 06:58 PM
जगन्नाथ धाम

श्री जगन्नाथ पूरी में जगन्नाथ जी का मन्दिर है, जो भगवान विष्णु को समर्पित है। यह भारत के ओडिशा राज्य के शहर पुरी में स्थित है। जगन्नाथ शब्द का अर्थ जगत के स्वामी होता है। इनकी नगरी ही जगन्नाथपुरी या पुरी कहलाती है। यह वैष्णव समाज का मन्दिर है, जो भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण की पूजा करते हैं | इस मन्दिर का वार्षिक रथ यात्रा उत्सव विश्व प्रसिद्ध है। इसमें मन्दिर के तीनों मुख्य देवता, भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भ्राता बलभद्र और बहन सुभद्रा तीनों को तीन अलग-अलग भव्य और सुसज्जित रथों में विराजमान करके नगर की यात्रा निकली जाती हैं।

कथा

इस मन्दिर से जुड़ी परम्परागत कथा के अनुसार, भगवान जगन्नाथ की नीलमणि से निर्मित मूल मूर्ति, एक अगरु वृक्ष के नीचे मिली थी। उस मूर्ति में इतना तेज और चमक थी के धर्म ने इसे पृथ्वी के नीचे छुपाना चाहा। एक दिन मालवा नरेश इंद्रद्युम्न को स्वप्न में यही मूर्ति दिखाई दी थी। तब उन्होंने ठीक वैसी ही मूर्ति बनवानी चाही मगर कोई वैसी मूर्ति नहीं बना सकता था | नरेश को भगवान विष्णु ने स्वपन में आकर बताया कि वह पुरी के समुद्र तट पर जाये और उसे एक दारु (लकड़ी) का लठ्ठा मिलेगा। उसी लकड़ी से वह मूर्ति का निर्माण कराये। राजा ने ऐसा ही किया और उसे लकड़ी का लठ्ठा मिल भी गया। उसके बाद देवशिल्पी विश्वकर्मा मूर्तिकार के रूप में उसके सामने उपस्थित हुए। किन्तु उन्होंने यह शर्त रखी, कि वे एक माह में मूर्ति तैयार कर देंगे, परन्तु तब तक वह एक कमरे में बन्द रहेंगे और राजा या कोई भी उस कमरे के अन्दर नहीं आये। माह के अंतिम दिन जब कई दिनों तक कोई भी आवाज नहीं आयी, तो उत्सुकता वश राजा ने कमरे में झाँका तो देखा के वहां कोई नहीं है और मूर्तियाँ अभी अपूर्ण हैं, उनके हाथ अभी नहीं बने थे। तब वही तीनों जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियाँ मन्दिर में स्थापित की गयीं।

इसी तरह एक कथा और है | चारण परम्परा मे माना जाता है की यहाँ पर भगवान द्वारिकाधिश के अध जले शव आये थे जिन्हे प्राचि मे प्रान त्याग के बाद समुद्र किनारे अग्निदाह दिया गया (कृष्ण, बल्भद्र और शुभद्रा तिनो को साथ) परन्तु समुद्र उफान पर होते ही तिनो आधे जले शव को बहाकर ले गया ,वह शव पुरि मे निकले ,पुरि के राजा ने तिनो शव को अलग अलग रथ मे रखा | शवो को पुरे नगर मे लोगो ने खुद रथो को खिंच कर घुमया और अंत मे जो दारु का लकडा शवो के साथ तैर कर आया था उसी  कि पेटि बनवाके उसमे धरति माता को समर्पित किया, आज भी उश परम्परा को नीभाया जाता है पर बहोत कम लोग इस तथ्य को जानते है और मानते हैं, ज्यादातर लोग तो इसे भगवान जिन्दा यहाँ पधारे थे एसा ही मानते है, चारण जग्दम्बा सोनल आई के गुरु पुज्य दोलतदान बापु की हस्तप्रतो मे भी यह उल्लेख मिलता है |

मठ: गोवर्धन मठ | बीज मंत्र : प्रज्ञानं ब्रह्म | वेदः ऋग्वेद | सन्यासी नाम : अरण्य | प्रथम मठाधीशः पद्मपाद | दिशा: पूर्व | सहायक शिव मंदिर: लिंगराज मंदिर | कुंभ : प्रयागराज

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