बैद्यनाथ ज्योतिलिंग

  • Updated: Sep 26 2023 07:27 PM
बैद्यनाथ ज्योतिलिंग

वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग चिकित्सा, उपचार, प्रकृति और स्वास्थ्य के देवता ज्योतिर्लिंग स्वरूप हैं | वैधनाथ मंदिर झारखण्ड में देवघर नामक सथान में अवस्थित एक प्रसिद्ध मंदिर है। वैद्यनाथ भी भगवान महादेव का ही एक नाम है, इस कारण लोग इसे 'वैद्यनाथ धाम' भी कहते हैं। यह एक सिद्धपीठ है। इस कारण इस लिंग को "कामना लिंग" भी कहा जाता हैं।

वैद्यनाथ मंदिर एक अत्यन्त पवित्र और भव्य मन्दिर स्थित है। हर वर्ष सावन के महीने में स्रावण मेला लगता है जिसमें लाखों श्रद्धालु "बोल-बम" "बम-बम" का जयकारा लगाते हुए सभी श्रद्धालु सुल्तानगंज जो देवघर से लगभग सौ किलोमीटर दूर है वहां से पवित्र गंगा का जल पैदल यात्रा कर बाबा को चढ़ाते हैं |

इस लिंग की स्थापत्य की कथा यह है कि एक बार राक्षसराज रावण ने हिमालय पर जाकर शिवजी की प्रसन्नता के लिये तपस्या की और अपने सिर काट-काटकर शिवलिंग पर चढ़ाने शुरू कर दिये। एक-एक करके नौ सिर चढ़ाने के बाद दसवाँ सिर भी काटने को ही था कि शिवजी प्रसन्न होकर प्रकट हो गये और उससे वरदान माँगने को कहा। रावण ने महादेव को लंका चलकर निवास करने के लिए कहा ताकि वो महादेव की रोज सेवा कर सके | महादेव ने एक शिवलिंग प्रकट किया और रावण को कहा के वो उस शिवलिंग को ले जाये जो शिव का ही रूप है | परन्तु रावण ने महादेव को साक्षात लंका ले जाने की जिद की तब महादेव स्वयं उस शिवलिंग में समां गए और ये चेतावनी दी कि यदि मार्ग में इसे पृथ्वी पर रख देगा तो वह वहीं अचल हो जाएगा। रावण शिवलिंग लेकर चला पर मार्ग में एक चिताभूमि आने पर उसे लघुशंका निवृत्ति की आवश्यकता हुई। तभी वहां एक ग्वाला गया तो रावण उस लिंग को उस ग्वाले को संभाल कर अपने हाथों में ही रखने को कहा (मान्यतानुसार भगवन गणेश जी उस ग्वाले के रूप में थे) और रावण लघुशंका-निवृत्ति करने चला गया। इधर उस ग्वाले ने ज्योतिर्लिंग को बहुत अधिक भारी अनुभव कर भूमि पर रख दिया। लौटने पर रावण पूरी शक्ति लगाकर भी उसे हिला भी सका और निराश होकर मूर्ति पर अपना अँगूठा गड़ाकर लंका को चला गया। यहाँ सभी देवताओं ने ब्रह्मा और विष्णु समेत शिवलिंग की पूजा की | शिव के दर्शन होने के बाद सभी देवताओं ने उसी स्थान पर शिवलिंग की स्थापना कर दी और उसके बाद सब अपने अपने धाम को चले गए |  यह वैद्यनाथ-ज्योतिर्लिग मनोवांछित फल देने वाला है।

देवघर का शाब्दिक अर्थ है देवी-देवताओं का निवास स्थान। मन्दिर के समीप ही एक विशाल तालाब भी स्थित है। बाबा बैद्यनाथ का मुख्य मन्दिर सबसे पुराना है जिसके आसपास अनेक अन्य मन्दिर भी बने हुए हैं। बाबा भोलेनाथ का मन्दिर माँ पार्वती जी के मन्दिर से जुड़ा हुआ है।

विश्व के सभी शिव मंदिरों के शीर्ष पर त्रिशूल लगा दीखता है मगर वैद्यनाथधाम परिसर के शिव, पार्वती, लक्ष्मी-नारायण अन्य सभी मंदिरों के शीर्ष पर पंचशूल लगे हैं। यहाँ प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि से 2 दिनों पूर्व बाबा मंदिर, माँ पार्वती लक्ष्मी-नारायण के मंदिरों से पंचशूल उतारे जाते हैं। इस दौरान पंचशूल को स्पर्श करने के लिए भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है।

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