केदारनाथ ज्योतिर्लिंग भारत के उत्तराखण्ड राज्य के रुद्रप्रयाग जिले में केदारनाथ मन्दिर में विराजमान है | केदारनाथ ज्योतिर्लिंग पांच केदार में भी शामिल है और केदारनाथ तीर्थ चार धाम में शामिल है | इस प्रकार केदारनाथ की अपनी अलग ही महत्ता है और श्रद्धालुओं के लिए महादेव के पवित्रतम तीर्थों में से एक है |
इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना का इतिहास यह है कि हिमालय के केदार शृंग पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनके प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया। यह स्थल केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर अवस्थित हैं। यहाँ पर भगवान शिव का स्वयम्भू शिवलिंग है जिसका जलाभिषेक करके पूजा की जाती है |
पुराणों में वर्णित कहानियों के अनुसार महाभारत के युद्ध के पश्चात पांडव अपने भाइयों और ब्रह्म हत्या से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव के दर्शन करना चाहते थे | मगर भगवान शिव पांडवों से खुश नहीं थे इसलिए दर्शन नहीं देना चाहते थे और वो अंतर्ध्यान हो कर केदार की पहाड़ियों में जा बसे | उन्हें खोजते हुए हिमालय तक आ पहुंचे । पांडवों से छिपने के लिए, शिव ने खुद को एक बैल में बदल दिया और जमीन पर अंतर्ध्यान हो गए। लेकिन भीम ने पहचान लिया कि बैल कोई और नहीं बल्कि शिव है और उन्होंने तुरंत बैल के पीठ का भाग पकड़ लिया। पकडे जाने के डर से बैल जमीन में अंतर्ध्यान हो जाता है और पांच अलग-अलग स्थानों पर फिर से दिखाई देता है- ऐसा माना जाता है कि जब भगवान शंकर बैल के रूप में अंतर्ध्यान हुए, तो उनके धड़ से ऊपर का भाग काठमाण्डू में प्रकट हुआ ( जो आज पशुपतिनाथ मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है), शिव की भुजाएं तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मद्महेश्वर में और जटा कल्पेश्वर में प्रकट हुए। इसलिए इन चार स्थानों सहित श्री केदारनाथ को पंचकेदार कहा जाता है।
मान्यतानुसार वर्तमान मंदिर ८वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा बनवाया गया जो पांडवों द्वारा द्वापर काल में बनाये गये पहले के मंदिर की बगल में है। ये मंदिर छः फुट ऊँचे चकौर चबूतरे पर बना हुआ है | मंदिर में मंडप और गर्भ गृह के चारों और परिक्रमा के लिए मार्ग बना हुआ है | मंदिर के बहार प्रमुख आँगन में नंदी भी विराजमान है |

मन्दिर को तीन भागों में बांटा जा सकता है 1. गर्भ गृह 2. मध्यभाग 3. सभा मण्डप । गर्भ गृह में बीच में भगवान केदारनाथ का स्वयंभू ज्योतिर्लिंग विराजमान है जिसके आगे वाले हिस्से पर गणपति और साथ ही माता पार्वती श्री यंत्र रूप में विराजमान है | ज्योतिर्लिंग में एक प्राकृतिक यज्ञोपवीत और स्फटिक माला दिखाई देती हैं जो प्राकृतिक है | ज्योतिर्लिंग में नव लिंगाकार विग्रह विधमान है इस कारण इस ज्योतिर्लिंग को नव लिंग केदार भी कहा जाता है | केदारनाथ मंदिर के कपाट मेष संक्रांति से पंद्रह दिन पूर्व खुलते हैं और अगहन संक्रांति के निकट बलराज की रात्रि चारों पहर की पूजा और भइया दूज के दिन, प्रातः चार बजे, श्री केदार को घृत कमल व वस्त्रादि की समाधि के साथ ही, कपाट बंद हो जाते हैं।
विक्रम संवत् 2083
🐅 शुक्रवार, 8 मई 2026