महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग

  • Updated: Sep 26 2023 07:15 PM
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर मध्य प्रदेश के उज्जैन में महालेश्वर मंदिर में स्थित है |महाकालेश्वर मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग में से एक है | स्वयंभू, भव्य और दक्षिणमुखी होने के कारण महाकालेश्वर महादेव की महत्ता अत्यन्त पुण्यदायी है। पुराणों में वर्णित कथानुसार इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लाभ स्वरुप मनुष्य मोक्ष प्राप्त करते हैं |

भगवान शिव आदिदेव हैं जो काल के भी काल हैं वो आदि, अनंत भी है, जो मनुष्य अकाल मृत्यु से भय रखते हैं उन्हें महाकाल के दर्शन अवश्य करने चाहिए | महाकाल की कृपा जिस पर होती है उसका काल भी कुछ नहीं अहित नहीं कर सकता |  

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा का वर्णन शिव पुराण में इस प्रकार है उज्जयिनी में चंद्रसेन नाम का राजा शासन करता था जो शिव भक्त भी था | उसकी मित्रता भगवान शिव के गणों में से एक मणिभद्र से थी | एक दिन मणिभद्र ने राजा को एक अमूल्य चिंतामणि प्रदान की, जिसको धारण करने से चंद्रसेन का प्रभुत्व बढ़ने लगा यश और कीर्ति दूर दूर तक फैलने लगी | दुसरे राज्य के राजाओं को जब इस बात का पता लगा तो उन्होंने मणि पाने के लिए राजा पर आक्रमण कर दिया और तब संकट में राजा ने भगवान शिव का ध्यान किया और सहायता मांगी तब भगवान शिव ने दर्शन दिए और उज्जैन में स्वयंभू शिवलिंग रूप में सदा रहने का निर्णय लिया | तब से महाकाल को ही उज्जैन का राजा मन जाता है |यहाँ की भस्म आरती और भांग श्रृंगार बहुत ही प्रसिद्ध है।

एक और कथा की मान्यता है यहाँ पौराणिक काल में वेदप्रिय नामक एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते थे जो हमेशा सदाचारी, वेद और शास्त्रों के स्वाध्याय में संलग्न में लगे रहते थे |

उनके देवप्रिय, प्रियमेधा, सुकृत और सुव्रत नमक चार तेजस्वी पुत्र थे, जो सद्गुणों में अपने माता पिता के समान ही थे। उसी समय रत्नमाल पर्वत पर दूषण नामक एक असुर ने ब्रह्मा जी से वर पाकर वेदवक्ता, धर्मपरयाण ब्राह्मणों पर आक्रमण किया। फिर उसने सेना के साथ अवन्ति पर आक्रमण किया। उसकी आज्ञा से दैत्यों ने अवन्ति को चारों ओर से घेर लिया। उस दैत्य से घबराये हुए लोगों को ब्रह्मण बंधुओं ने आश्वासन दिया के महादेव पर भरोसा रखें महादेव अपने भक्तों का कभी अहित नहीं होने देंगे | इतना कहकर वो शिव की आराधना करने लगे जब दूषण उसकी सेना सहित वहां पंहुचा और उनको मरने के लिए आगे बड़ा तभी महादेव स्वयं महाकाल रूप में प्रकट हुए | महाकाल शंकर ने तत्काल दूषण को सेनासहित भस्म कर दिया।

देवताओं ने आकाश से फूलों की वर्षा की और महाकाल की पूजा की। स्वयं महाकाल शिव ने प्रसन्न होकर उन ब्राह्मणों से कहा – “तुम लोग वर माँगो

तब सभी ब्राह्मणों ने भक्तिभाव से कहा – "हे महाकाल ! दुष्टों को दंड देनेवाले प्रभु ! आप हमें मोक्ष प्रदान करें और आप जनसाधारण की रक्षा के लिए सदा यहीं निवास करें। हे शम्भू ! अपना दर्शन करने वाले मनुष्यों का आप सदा उद्धार करें।"

इसके उपरांत जहां भगवान शिव ने दर्शन दिए थे वो स्थान एक कोस के व्यास में भगवान शिव के तीर्थ के रूप में महाकालेश्वर के नाम से पूजा जाने लगा |

महाशिवरात्रि एवं श्रावण मास में हर सोमवार को इस मंदिर में अपार भीड़ होती है। मंदिर से लगा एक छोटा-सा जलस्रोत है जिसे कोटितीर्थ कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि मुगलों ने जब मंदिर को तुड़वाया तो शिवलिंग को इसी कोटितीर्थ में छिपा दिया गया था। बाद में इसकी पुनर्प्रतिष्ठा करायी गयी। सन 1968 के सिंहस्थ महापर्व के पूर्व मुख्य द्वार का विस्तार कर सुसज्जित कर लिया गया था। इसके अलावा निकासी के लिए एक अन्य द्वार का निर्माण भी कराया गया था। महाकालेश्वर मंदिर की व्यवस्था के लिए एक प्रशासनिक समिति का गठन किया गया है जिसके निर्देशन में यहाँ की व्यवस्था सुचारु रूप से चल रही है। हाल ही में इसके 118 शिखरों पर 16 किलो स्वर्ण की परत चढ़ाई गई है।

उज्जैन में महाकालेश्वर मंदिर के शिव और भी विख्यात मंदिर स्थित है | जैसे श्री बड़े गणेश जी का मंदिर, मंगलनाथ मंदिर, काल भैरव मंदिर, मंगलनाथ मंदिर, हरसिद्धि मंदिर इत्यादि |

उज्जैन का सिंहस्थ कुम्भ का महान स्नान पर्व भी मनाया जाता है। भारत में चार स्थानों पर कुम्भ का आयोजन किया जाता है। प्रयाग, नासिक, हरिद्धार और उज्जैन में लगने वाले कुम्भ मेलों के इस आस्था के पर्व को ही सिंहस्थ के नाम से पुकारा जाता है।

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