आमला एकादशी

  • Updated: Aug 02 2023 07:12 PM
आमला एकादशी

भगवान विष्णु ने कहा है कि जो प्राणी स्वर्ग और मोक्ष की इच्छा रखते हैं, उनके लिए फाल्गुन शुक्ल पक्ष की पुष्य नक्षत्र में आने वाली एकादशी व्रत अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस एकादशी को आमलकी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। शास्त्रों में कहा जाता है कि आंवला वृक्ष नदियों में गंगा के समान महत्वपूर्ण है और देवताओं में भगवान विष्णु को यहां अधिक प्रिय हैं। भगवान विष्णु ने जब सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्मा को जन्म दिया, तब उन्होंने आंवले के वृक्ष को भी जन्म दिया। आंवले को भगवान विष्णु ने आदि वृक्ष के रूप में स्थापित किया है। इसे मान्यता है कि ईश्वर का स्वरूप आंवले के हर अंग में निवास करता है।

यहाँ व्रत रखने की प्रक्रिया विस्तार से बताई गई है:

स्नान करें और भगवान विष्णु की प्रतिमा के सामने हाथ में तिल, कुश, मुद्रा, और जल लेकर संकल्प करें कि आप भगवान विष्णु की प्रसन्नता और मोक्ष की कामना से आमलकी एकादशी का व्रत रख रहें हैं। आप भगवान की कृपा और आशीर्वाद की कामना करें। संकल्प के बाद षोडशोपचार पूजा करें।

भगवान की पूजा के बाद, आंवले के वृक्ष की पूजा करें। वृक्ष के चारों ओर की भूमि को साफ करें और उसे गौमय से शुद्ध करें। फिर वृक्ष की जड़ में एक वेदी बनाएँ और उस पर कलश स्थापित करें। कलश में देवताओं, तीर्थों, और सागर को आमंत्रित करें। कलश में सुगंध, पंच रत्न, और पंच पल्लव रखें। उसके बाद दीपक जलाएँ। कलश के घट में श्रीखंड चंदन का लेप करें और वस्त्र धारण करें। अंत में, कलश के ऊपर भगवान विष्णु के छठे अवतार, परशुराम, की स्वर्ण मूर्ति स्थापित करें और उनकी पूजा करें। रात्रि में, भगवत कथा और भजन कीर्तन करते हुए प्रभु का स्मरण करें।

द्वादशी के दिन, सुबह ब्राह्मण को भोजन कराएं और दक्षिणा देकर परशुराम की मूर्ति सहित कलश ब्राह्मण को भेंट करें। इन क्रियाओं के बाद, परायण करें और अन्न और जल ग्रहण करें।

पश्चिमी राजस्थान में आंवला वृक्षों की अपेक्षा कम होने के कारण, वहां के लोग खेजड़ी वृक्ष की पूजा करते हैं।

यहाँ आपको आमलकी एकादशी व्रत के संबंध में संपूर्ण जानकारी दी गई है। यह व्रत आपके आंतरिक शांति और आध्यात्मिकता के लिए महत्वपूर्ण है।

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