अजा एकादशी, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में मनाई जाने वाली एकादशी है। इस व्रत का महत्त्व और विधि के साथ इसकी कथा निम्नलिखित है:
व्रत कथा:
बहुत समय पहले की बात है, राजा हरिशचंद्र नामक एक चक्रवर्ती राजा राज्य करता था। एक दिन उसने सत्य को पकड़ा हुआ देखा और उसकी शक्ति को अनुभव करके उसे अपने राज्य का सम्पूर्ण संपदा और अधिकार सौंप दिया। इसके बाद राजा हरिशचंद्र ने अपनी स्त्री, पुत्र, धन, राज्य और अपने व्यक्तिगत सुख-समृद्धि सब कुछ त्याग दिया और संन्यास धारण कर दी।
राजा हरिशचंद्र को अपने भगवान की आराधना करने की अत्याधिक इच्छा हो गई थी। उसने मन बना लिया कि वह भगवान ऋषिकेश की पूजा करेगा और उनकी कृपा से वैकुंठ प्राप्त करेगा। वह एकादशी तिथि के दिन भगवान ऋषिकेश की पूजा के लिए उठ बैठा और पूरे व्रत का पालन किया। रात्रि भर जागरण करते हुए उसने भगवान की आराधना की।
व्रत के पूर्ण होने पर एक आकाशीय वाहन से देवताओं की सभा में राजा को बुलाया गया। उसे स्वर्ग के दर्शन हुए और उसे विशेष आनंद का अनुभव हुआ। राजा को स्वर्ग और आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति हुई और उसे पूर्ण सुख-शांति प्राप्त हुई।
व्रत की विधि:
अजा एकादशी के दिन व्रत का पालन किया जाता है। इस दिन व्रत करने वालों को नियमित रूप से उठकर नित्यकर्म और स्नान करना चाहिए। विधिपूर्वक पूजा-अर्चना करनी चाहिए और भगवान ऋषिकेश की आराधना की जानी चाहिए। भक्ति और आदर के साथ इस व्रत का पालन किया जाना चाहिए। रात्रि में जागरण करते हुए भगवान की गान, कीर्तन, पूजा, आरती आदि की जानी चाहिए। अगले दिन, एकादशी के दिन उठकर नित्यकर्म करने के बाद व्रत को समाप्त कर सकते हैं।
अजा एकादशी का महत्त्व:
अजा एकादशी के व्रत का पालन करने से संसारिक और आध्यात्मिक सुख-शांति प्राप्त होती है। इस व्रत के पुण्य का प्रभाव बहुत महान माना जाता है और इसे अश्वमेध यज्ञ के फल के समान माना जाता है। यह व्रत पापों का नाश करने और स्वर्ग की प्राप्ति करने का अद्वितीय उपाय माना जाता है। इस एकादशी का उच्चारण और सुनना सभी को शुभ होता है और इसके पाठ से सभी पापों का नाश होता है। भगवान कृष्ण को इस दिन विशेष रूप से प्रसन्न होते हैं और अपनी कृपा प्रदान करते हैं।
यह थी अजा एकादशी की कथा, व्रत की विधि और महत्त्व की जानकारी। इस व्रत को यथार्थ समर्पित होकर पालने से व्रतार्थी को उच्च स्थान की प्राप्ति होती है और उसे भगवान कृष्ण की कृपा मिलती है।
ॐ नमो नारायणा
विक्रम संवत् 2083
वरुथिनी एकादशी, वल्लभाचार्य जयंती
जलियाँवाला बाग स्मृति-दिवस
🔱 सोमवार, 13 अप्रैल 2026