पापांकुशा एकादशी

  • Updated: Aug 02 2023 06:44 PM
पापांकुशा एकादशी

धर्मराज युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवन आश्विन शुक्ल एकादशी का क्या नाम है? अब आप कृपा करके इसकी विधि और फल बताइये। भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे युधिष्ठिर पापों का नाश करने वाली इस एकादशी का नाम पापांकुशा एकादशी है। हे राजन इस दिन मनुष्य को विधिपूर्वक भगवान पद्मनाभ की पूजा करनी चाहिए। यह एकादशी मनुष्य को मनोवांछित फल देने वाली और स्वर्गलोक को प्राप्त करने वाली है।

मनुष्य को जो फल बहुत दिनों तक कठिन तपस्या से प्राप्त होता है, वह फल भगवान गरुड़ध्वज को प्रणाम करने से प्राप्त होता है। जो मनुष्य अज्ञानतावश अनेक पाप करते हैं परन्तु हरि को प्रणाम करते हैं, वे नरक में नहीं जाते। विष्णु के नाम का जप करने मात्र से संसार के सभी तीर्थों के पुण्यों का फल प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य धनुष बाण धारण करने वाले भगवान विष्णु की शरण में जाते हैं, उन्हें कभी भी यम की यातना नहीं भोगनी पड़ती।

जो मनुष्य वैष्णव होकर शिव की और शैव होकर विष्णु की निन्दा करते हैं, वे निश्चय ही नरक के वासी होते हैं। हजारों वाजपेय और अश्वमेध यज्ञों का जो फल मिलता है, वह एकादशी व्रत के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं होता। संसार में एकादशी के समान कोई पुण्य नहीं है। पवित्र तीनों लोकों में इसके समान कुछ भी नहीं है। इस एकादशी के समान कोई व्रत नहीं है। जब तक मनुष्य पद्मनाभ की एकादशी का व्रत नहीं करते, तब तक उनके शरीर में पाप निवास कर सकते हैं।

हे राजेन्द्र यह एकादशी स्वर्ग, मोक्ष, आरोग्य, सुन्दर स्त्री और अन्न और धन की देने वाली है। गंगा, गया, काशी, कुरुक्षेत्र और पुष्कर में भी एकादशी के व्रत के समान पुण्य नहीं है। हरिवासर और एकादशी का व्रत और जागरण करने से मनुष्य सहज ही विष्णु पद को प्राप्त कर लेता है। हे युधिष्ठिर इस व्रत को करने वाले माता पक्ष से दस पीढ़ी, पितृ पक्ष से दस पीढ़ी, स्त्री पक्ष से दस पीढ़ी और मित्र पक्ष से दस पीढ़ी का उद्धार करते हैं। वह दिव्य शरीर धारण कर, चतुर्भुज रूप धारण करके, पीताम्बर धारण कर हाथ में माला लेकर गरुड़ पर चढ़कर विष्णुलोक को जाता है।

हे नृपोत्तम बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था में इस व्रत को करने से पापी मनुष्य को भी दु: की प्राप्ति नहीं होती अपितु मोक्ष की प्राप्ति होती है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की इस पापांकुशा एकादशी का व्रत करने वाले मनुष्य अंत समय में हरिलोक को प्राप्त होते हैं और समस्त पापों से मुक्त हो जाते हैं। सोना, तिल, भूमि, गाय, अन्न, जल, छत्र और जूते दान करने से मनुष्य यमराज को नहीं देखता।

जो मनुष्य अपने जीवन के दिन बिना किसी प्रकार के सत्कर्म किये व्यतीत करता है, वह लोहार की भट्टी के समान श्वास लेने वाले निर्जीव के समान है। गरीब लोगों को भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान देना चाहिए और अमीर लोगों को सरोवर, उद्यान, घर आदि बनवाकर दान देना चाहिए। ऐसे लोगों को यम का द्वार नहीं देखना पड़ता और वे संसार में लंबे समय तक जीवित रहते हैं, धनी, कुलीन और रोगमुक्त रहते हैं।

ॐ नमो नारायण

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