पापमोचिनी एकादशी

  • Updated: Aug 02 2023 07:24 PM
पापमोचिनी एकादशी

हिन्दू धर्म में कहा गया है कि संसार में उत्पन्न होने वाले हर मनुष्य को अपने जीवन में जाने अनजाने पाप करने से बचना मुश्किल है। पाप एक प्रकार की ग़लती है और इसके परिणामस्वरूप हमें दंड भोगना पड़ता है। ईश्वरीय विधान के अनुसार पाप के दंड से बचा जा सकता हैं अगर पापमोचिनी एकादशी का व्रत रखें। पौराणिक कथानुसार चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी पाप मोचिनी अर्थात पाप को नष्ट करने वाली एकादशी कहते हैं। कथानुसार भगवान अर्जुन से कहते हैं, राजा मान्धाता के मन में संसय हुआ और लोमस ऋषि से राजा ने पुछा के हे महात्मा मनुष्य अपने  द्वारा अनजाने में किये गए पापों से कैसे मुक्त है ?

राजा के इस प्रश्न का उत्तर देते हुए एक कथा सुनाने लगे - चैत्ररथ नाम का एक सुन्दर वन था जहाँ च्वयन ऋषि के पुत्र तपस्यारत थे | उसी वन में मंजुघोष नमक अप्सरा की नजर तपस्यारत ऋषि पर पड़ी | अप्सरा उनपर मोहित हो गयी और उन्हें अपनी और आकर्षित करने के लिए प्रयत्न करने लगी | कामदेव के वहां से गुजरते समय, उनकी नज़र एक अप्सरा पर पड़ी और वे उसकी मनोभावना को समझकर उसकी सहायता करने का निर्णय लिया। अप्सरा ने अपने प्रयासों से सफलता प्राप्त की और ऋषि कामदेव को प्रभावित कर उन्हें अपने वश में कर लिया।

काम के वशीभूत होकर ऋषि की तपस्या भंग हुयी और वे अपना व्रत भूल कर अप्सरा के साथ रमन करने लगे | इसी तरह कई वर्ष बीत गए तब ऋषि की चेतना दोबारा जाग्रत हुयी तब उन्हें अनुभव हुआ के वो शिव की तपस्या से विरक्त हो चुकें हैं और इसका एक मात्र कारण मंजुघोष अप्सरा है | ऋषि अप्सरा पर क्रोधित हुए और उसको श्राप दे दिया के तुम पिशाचिनी हो जाओगी | श्राप से दु:खी होकर वह ऋषि के पैरों पर गिर पड़ी और श्राप से मुक्ति के लिए अनुनय करने लगी।

मेधावी ऋषि को अप्सरा पर दया आ गयी और उन्होंने उसे चैत्र कृष्ण की एकादशी का व्रत विधि अनुसार करने को कहा | काम के भोग के कारण ऋषि भी तेज रहित हो गए थे तो उन्होंने भी उस व्रत का पालन करने का निर्णय किया | दोनों ने विधिवत व्रत का पालन किया जिसके फल स्वरुप ऋषि का पाप नष्ट हो गया अप्सरा भी पुनः अति सुन्दर रूप को प्राप्त कर गयी | 

इस व्रत में श्री नारायण हरी के चतुर्भुज रूप की उपासना करते हैं | व्रत रखने वाले को दशमी के दिन एक बार सात्विक भोजन करके मन से भोग विलास की भावना को निकालकर हरि के चरणों में मन को लगाएं। एकादशी के दिन सूर्योदय काल में स्नान करके व्रत का संकल्प करें। संकल्प के उपरान्त षोड्षोपचार सहित श्री विष्णु की पूजा करें। पूजा के पश्चात भगवान के समक्ष बैठकर भग्वद् कथा का पाठ अथवा श्रवण करें। एकादशी तिथि को जागरण करने से कई गुणा पुण्य मिलता है अत: रात्रि में भी निराहार रहकर भजन कीर्तन करते हुए जागरण करें। द्वादशी के दिन प्रात: स्नान करके विष्णु भगवान की पूजा करें फिर ब्रह्मणों को भोजन करवाकर दक्षिणा सहित विदा करें पश्चात स्वयं भोजन करें।

ॐ नमो नारायणा

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