परमा एकादशी

  • Updated: Aug 02 2023 07:27 PM
परमा एकादशी

हिन्दू मान्यता में एकादशी व्रत का बहुत महत्त्व है | एकादशी एक मास में दो बार और साल में 24 होती हैं | अधिक के मास जिसे मलमास भी कहते हैं और 3 साल में एक बार आता है तब एकादशी की संख्या 26 होती है | अधिकमास में कृष्ण पक्ष में जो एकादशी आती है उसे परमा एकादशी कहते हैं |

जब अर्जुन ने श्री कृष्ण से स्वयं परमा एकादशी के माहात्म्य के बारे में पुछा था और श्री कृष्ण ने व्रत की कथा और विधि का वर्णन किया |

काम्पिल्य नामक नगर में सुमेधा नाम का ब्राह्मण अपनी पत्नी और परिवार के साथ निवास करता था | सुमेधा बहुत ही धर्मात्मा और पुण्यवान था और उसकी पत्नी भी पतिव्रता थी | एक दिन सुमेधा ने धन के आभाव के कारण अपनी पत्नी से कहा के मुझे प्रदेश जाकर धन अर्जित करना चाहिए |

उसकी पत्नी ने उसको कहा मनुष्य होने ही कर्मो का फल पता है | हमें अपने पुनर्जन्म के फलों के कारण ही गरीबी मिली है, तो हमें यहीं रहकर अपना कर्म करते हुए ईश्वर की इच्छा के अनुरूप अपना जीवन यापन करना होगा | सुमेधा को अपनी पत्नी की बात अच्छी लगी और उसने प्रदेश जाने का विचार त्याग दिया | एक दिन सौभाग्य से कौण्डिल्य ऋषि का ब्राह्मण के घर आगमन हुआ और उन्होंने ऋषि की अपने सामर्थ्य अनुसार खूब सेवा की |

ऋषि उनके सेवा भाव से अत्यंत प्रशन्न हुए और सुमेधा ने अपनी पत्नी सहित उनसे अपनी गरीबी और दरिद्रता को दूर करने का उपाय जानना चाहा | तब ऋषि कौण्डिल्य ने कहा के अधिकमास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को परमा एकादशी कहते हैं आप दोनों नियम पूर्वक उसका व्रत करें | परमा एकादशी धन वैभव प्रदान करती है और सभी पापों को नष्ट करती है | धनाधिपति कुबेर ने भी परमा एकादशी के व्रत का पालन किया था जिसके फलस्वरूप महादेव ने उन्हें धनाध्यक्ष का पद प्रदान किया था |

ऋषि के कहे अनुसार समय आने पर सुमेधा और उसकी पत्नी ने परमा एकादशी का व्रत रखा जिसके फलस्वरूप उनकी गरीबी और दरिद्रता का अंत हो गया और शेष जीवन सुखपूर्वक बिता कर अंत में विष्णु धाम को प्रस्थान कर गए

इस एकादशी व्रत की विधि बड़ी ही कठिन है। इस व्रत में पांच दिनों तक निराहार रहने का व्रत लिया जाता है। व्रती को एकादशी के दिन स्नान करके भगवान विष्णु के समक्ष बैठकर हाथ में जल एवं फूल लेकर संकल्प करना चाहिए। इसके पश्चात भगवान की पूजा करनी चाहिए। इसके बाद पांच दिनों तक श्री हरि में मन लगाकर व्रत का पालन करना चाहिए। पांचवें दिन ब्रह्मण को भोजन करवाकर दान दक्षिणा सहित विदा करने के पश्चात व्रती को स्वयं भोजन करना चाहिए।

ॐ नमो नारायणा 

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