कार्तिक मास की कृष्ण एकादशी को रमा एकादशी कहते है | धर्मराज युधिष्ठिर ने श्री कृष्ण इस एकादशी के माहात्म्य के बारे में पुछा की इस पापनाशिनी एकादशी का माहात्म्य स्वयं अपने मुख से बताइए |
तब श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को कहा के हे राजन एक बार मुचुकुंद नमक राजा था जो बहुत ही पराक्रमी था, इंद्र, याम, कुबेर और विभीषण जैसे राजा भी उसके मित्र थे | राजा विष्णु भक्त भी था और सम्पूर्ण प्रजा समेत एकादशी के व्रत का पालन करता था | उस राजा की एक सुकन्या थी जिसकी नाम चन्द्रभागा था और उसके पति का नाम शोभन था |  शोभन एक दिन अपनी सुसराल गया और एकादशी का व्रत नजदीक था | राजा ने सारे राज्य में ढोल बजवा कर घोषणा करवाई थी के एकादशी के दिन सभी एकादशी के व्रत का पालन करेंगे और एकादशी के दिन भोजन ग्रहण नहीं करेंगे |
ये सब सुनकर शोभन और चंद्रभागा को अत्यंत चिंता हुयी क्यूंकि शोभन अत्यंत दुर्लभ था | शोभन और चंद्रभागा आपस में बात करने लगे | शोभन कहने लगा की मैं भूख सहन नहीं कर सकता | चंद्रभागा ने कहा के अगर आप व्रत नहीं रख सकते तो आप किसी और स्थान पर चलें जाएँ | शोभन ने कहा के मैं ऐसा करूँगा, मैं नियम से व्रत रखूँगा श्री हरि की जो इच्छा होगी वही होगा |
एकादशी के दिन शोभन ने व्रत रखा परन्तु वह अत्यंत भूख और प्यास से पीड़ित था | रात्रि में जागरण का आयोजन हुआ जो हरी भक्तों को आनंद दायी था परन्तु शोभन के लिए कष्ट दायी सिद्ध हुआ | प्रातः काल तक शोभन ने प्राण त्याग दिए | राजा ने विधिपूर्वक शोभन का अंतिम संस्कार किया और सभी अंत्येष्टि क्रिया के उपरांत चंद्रभागा अपने पिता के घर ही रहने लगी |
रमा एकादशी के प्रभाव से शोभन को मन्दरांचल पर्वत पर सम्पूर्ण वैभव युक्त और शत्रु मुक्त एक सुन्दर देवपुर प्राप्त हुआ | उस देवपुर की शोभा देखते ही बनती थी, शोभन वहां पर इंद्र के समान शुशोभित था | एक समय सोम शर्मा जो मुचुकुन्द नगर का ही निवासी था वो तीर्थ यात्रा करता हुआ उस नगर जा पंहुचा | ब्राह्मण शोभन को पहचानता था तो उसके निकट चला गया | शोभन भी ब्राह्मण को पहचान गया और उसने अपना आसन दिया और ब्राह्मण को कुशल क्षेम पुछा | ब्राह्मण ने राजा को कहा के मुचुकुन्द नगर के निवासी, राजा और आपकी पत्नी सब कुशल से हैं | परन्तु आपको ये सुन्दर नगर कैसे प्राप्त हुआ |
राजा ने कहा के ये सब मुझे रमा एकादशी के व्रत के प्रभाव से प्राप्त हुआ है | ये अस्थिर है | ब्राह्मण ने पुछा के ये सब अस्थिर क्यों है और इसको स्थिर करने के क्या उपाय है आप मुझे बताएं | तब राजा ने कहा के मैंने एकादशी के व्रत अश्रद्धा से किया है इसलिए ये सुख स्थिर नहीं है | अगर आप मुचुकुन्द राजा की कन्या चंद्रभागा को सारा वृतांत बता सके तो ये सब स्थिर हो सकता है |
ये सब सुनने के बाद सोम शर्मा नगर वापिस लौट आया तब सारी कथा चंद्रभागा को विधिवत सुनाई | चंद्रभागा सब सुनकर बड़ी खुश हुयी "हे ब्राह्मण आपने ये सब आँखों देखि बता रहे हैं या स्वपन्न में देखा बता रहे हैं ?"ब्राह्मण ने जवाब दिया, "हे पुत्री मैंने महावन में तुम्हारे पति को प्रत्यक्ष देखा है। साथ ही ऐसा नगर जिससे उनका नगर नहीं जीता जा सकता है, मैंने देवताओं के नगर के समान उनका नगर भी देखा है। यह सब स्थिर नहीं है। जिस प्रकार वह स्थिर रह सके, उसका उपाय करना चाहिए।
चंद्रभागा ने कहा, "हे विप्र आप मुझे वहां ले चलें, मुझे पतिदेव के दर्शन की तीव्र आकांक्षा है। मैं अपने किये हुए पुण्य से उस नगर को स्थिर बना दूंगी। कृपया ऐसा कार्य कीजिए जिससे हमारा संयोग हो सके, क्योंकि वियोगी को मिला देना महान पुण्य है।" सोम शर्मा ने इस बात को सुनकर चंद्रभागा को साथ लेकर मंदराचल पर्वत के पास वामदेव ऋषि के आश्रम पर जाया। वामदेवजी ने सब कुछ सुनकर वेद मंत्रों के उच्चारण से चंद्रभागा का अभिषेक किया। तब ऋषि के मंत्र के प्रभाव और एकादशी व्रत के कारण चंद्रभागा का शरीर दिव्य हो गया और वह दिव्य गति को प्राप्त हुई।
इसके बाद बहुत आनंद के साथ अपने पति के पास गई। अपनी प्रिय पत्नी को देखकर शोभन अति प्रसन्न हुआ और उसे बुलाकर अपनी बाईं तरफ बिठा लिया। चंद्रभागा ने कहा, "हे प्राणनाथ कृपया आप मेरे पुण्य को स्वीकार कीजिए। मैंने अपने पिता के घर से जब से आठ वर्ष की थी, विधिपूर्वक एकादशी व्रत को श्रद्धापूर्वक किया है। इस पुण्य के प्रभाव से आपका यह नगर स्थिर हो जाएगा और प्रलय के अंत तक सभी कर्मों से युक्त रहेगा।" इस प्रकार चंद्रभागा ने दिव्य आभूषणों और वस्त्रों से सुसज्जित होकर अपने पति के साथ आनंदपूर्वक रहना शुरू किया।
"हे राजन यह मैंने रमा एकादशी का माहात्म्य कहा है, जो मनुष्य इस व्रत को करते हैं, उनके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की एकादशी दोनों समान हैं, इनमें कोई भेदभाव नहीं है। दोनों ही समान फल देती हैं। जो मनुष्य इस माहात्म्य को पढ़ते या सुनते हैं, वे सभी पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को प्राप्त होते हैं।" इति शुभम्।
ॐ नमो नारायणा
विक्रम संवत् 2083
वरुथिनी एकादशी, वल्लभाचार्य जयंती
जलियाँवाला बाग स्मृति-दिवस
🔱 सोमवार, 13 अप्रैल 2026