वैशाखमास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को को वरुथिनी एकादशी कहते हैं | वरुथिनी एकादशी महा पुण्य दायिनी होती है | वरुथिनी के व्रत से मान्धाता और धुन्धुमार नामक राजाओं को भी स्वर्गलोक की प्राप्ति हुयी थी | जो फल दस हजार वर्षों की तपस्या से प्राप्त होता है वही फल वरुथिनी एकादशी के व्रत से प्राप्त होता है |
ऐसी मान्यता है के घोड़े के दान से हाथी का दान बड़ा है । भूमिदान उससे भी बड़ा है । भूिमदान से भी अिधक श्रेष्ठ तिल का दान है । तिलदान से बढ़कर सोने का सोने का दान है औरस्वर्णदान से बढ़कर अन्नदान है, क्यूंकि सभी देवी और देवताओं और मनुष्यों को भी अन्न से ही तृप्ति मिलती है । ज्ञानी पुरुषों के अनुसार कन्यादान भी इसी समान श्रेष्ठ है । कन्यादान के तुल्य ही गाय का दान है, यह साक्षात् भगवान का कथन है । इन सब दानों से भी बड़ा विद्या का दान का दान है । मनुंय &lsquoवरुिथनी एकादशी का व्रत करके विद्या दान के समान फल अर्जित कर लेता है । जो मनुष्य अपने सामर्थ्य के अनुसार अपनी कन्या को आभूषणों से विभूषित करके पवित्र भाव से कन्या का दान करता है, उसके अनेकों पुण्यों का लाभ एक साथ प्राप्त होता है। &lsquoवरुिथनी एकादशी&rsquo करके भी मनुष्य उसी के समान फल पता है ।
इस व्रत का पालन करने वाले को रात को जागरण करके भगवान मधुसूदन का पूजन करना चाहिए । अत: पापभीरु मनुष्यों को प्रयत्न करके इस एकादशी का व्रत करना चाहिए । इसके पढ़ने और सुनने से सहस्त्र गौदान का फल मिलता है और मनुष्य सब पापों से मुक्त होता है ।
ॐ नमो नारायणा
विक्रम संवत् 2083
वरुथिनी एकादशी, वल्लभाचार्य जयंती
जलियाँवाला बाग स्मृति-दिवस
🔱 सोमवार, 13 अप्रैल 2026