विजया एकादशी, जिसे अपने नाम के अनुसार विजय प्राप्ति करने वाली मानी जाती है, एक प्रमुख हिन्दू व्रत है। जब हम भयंकर शत्रुओं द्वारा घेरे जाते हैं और हार का सामना करना पड़ता है, तब विजया नामक एकादशी हमें विजय प्राप्त करने की शक्ति प्रदान करती है। प्राचीन काल में, कई राजाओं और महाराजों ने इस व्रत के महत्व के कारण अपनी निश्चित हार को जीत में बदल देखा है। पद्म पुराण और स्कन्द पुराण में इस महाव्रत के बारे में अत्यंत सुंदर वर्णन मिलता है।
अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से एकादशी के महात्मय को सुनकर आनंदित हो रहे हैं। विजया एकादशी के महात्मय को जानने के बाद, अर्जुन श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी, जिसे विजया एकादशी के नाम से जाना जाता है, का महात्मय क्या है। वे कहते हैं कि इस एकादशी का व्रत रखने वाला सदैव विजयी रहता है। हे अर्जुन, तुम मेरे प्रिय सखा हो, इसलिए मैं तुम्हें इस व्रत की कथा सुना रहा हूं। आज तक, मैंने इस व्रत की कथा किसी को नहीं सुनाई है, केवल देवर्षि नारद ही इस कथा को ब्रह्मा जी से सुन पाए हैं। तुम मेरे प्रिय हो, इसलिए तुमसे मैं यह कथा सुना रहा हूं।
त्रेतायुग की घटना है जब भगवान श्री रामचन्द्र जी, जो विष्णु के अवतार थे, अपनी पत्नी सीता को ढूंढ़ने के लिए सागर तट पर पहुंचे। सागर तट पर एक पक्षी जटायु नामक भगवान का परम भक्त रहता था। जटायु ने बताया कि रावण, लंका नगरी का राजा, सीता माता को ले गया है और वह आशोक वाटिका में बंद हैं। जानकरी प्राप्त करने के बाद, श्रीरामचंद्र जी ने अपनी वानर सेना के साथ लंका पर हमला करने की तैयारी शुरू की, लेकिन सागर के जल से भरे दुर्गम मार्ग से लंका पहुंचना असंभव था।
इस अवस्था में, भगवान श्री रामचन्द्र जी चिंतित हो गए क्योंकि उन्हें सागर पार करने का कोई मार्ग नजर नहीं आ रहा था। तब उन्होंने अपने भाई लक्ष्मण से पूछा कि क्या उनके पास इस समस्या का कोई समाधान है। लक्ष्मण ने कहा कि हे भगवान, आप स्वयं सर्वशक्तिमान हैं, इसलिए आपको किसी भी बात की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। हालांकि, मैं यह कह सकता हूं कि आधे योजन दूर परम ज्ञानी वकदाल्भ्य मुनि के आश्रम में ही इस समस्या का हल मिल सकता है।
श्री रामचन्द्र जी और लक्ष्मण ने वकदाल्भ्य मुनि के आश्रम में पहुंचकर उन्हें प्रणाम किया और अपना प्रश्न उनके सामने रख दिया। मुनिवर ने कहा कि हे राम, आप अपनी सेना समेत फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत रखें, इस व्रत से आप निश्चित रूप से सागर को पार कर रावण को पराजित करेंगे। श्री रामचन्द्र जी ने तब उस तिथि के आने पर मुनिवर के दिए गए विधान के अनुसार एकादशी का व्रत रखा और सागर पर पुल बांधकर लंका की ओर आगे बढ़े। राम और रावण के बीच युद्ध हुआ, जिसमें रावण को मार गिराया गया।
श्री रामचन्द्र जी ने विजया एकादशी का व्रत इस विधि से किया। दशमी के दिन एक वेदी बनाई गई और उस पर सप्तधान रखे गए। उन्होंने अपने सामर्थ्य के अनुसार स्वर्ण, रजत, तांबा या मिट्टी का कलश बनाकर उस पर स्थापित किया। एकादशी के दिन उस कलश में पंचपल्लव रखकर श्री विष्णु की मूर्ति स्थापित की गई और विधि के साथ धूप, दीप, चंदन, फूल, फल और तुलसी से प्रभु की पूजा की गई। व्रती पूरे दिन भगवान की कथा का पाठ करते रहे और सुनते रहे और रात्रि में कलश के सामने बैठकर जागरण करे। द्वादशी के दिन कलश को योग्य ब्राह्मण या पंडित को दान कर दिया जाता है।
ॐ नमो नारायणा 
विक्रम संवत् 2083
वरुथिनी एकादशी, वल्लभाचार्य जयंती
जलियाँवाला बाग स्मृति-दिवस
🔱 सोमवार, 13 अप्रैल 2026